वो बर्फीले फूलों की बारिश

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कुछ यादें दिल से कभी जुदा नहीं होतीं। न समय की धूल उन पर जमती है और न ही उम्र के बढ़ते पड़ाव में वह पीछे छूटती है। रूपकुंड की ऐसी ही सुनहरी यादें जेहन में हमेशा ताजा रहती हैं। जरा दिल के कोने में झांको और सफेद चादर में लिपटी पहाड़ियों और उनके बीचोंबीच किसी खूबसूरत स्वीमिंग पूल जैसा रूपकुंड नजर आने लगता है। ढाई दिन तक पैदल चलने के बाद 16500 फुट की उंचाई पर फूलों की बर्फबारी को आखिर कौन भुला सकता है?
बात 2015 जून की है, उन दिनों मैं जयपुर में नौकरी कर रहा था। किसी काम से गुलाबी नगरी आए पुराने दोस्त नीरज से मुलाकात हुई, तो पहली नजर उसके ट्रैकिंग बैग पर ही पड़ी। पूछा तो पता चला कि वह रूपकुंड जा रहा है। ये नाम जेहन में बहुत पहले से अटका हुआ था। वरिष्ठ पत्रकार और घूमने के शौकीन उपेंद्र स्वामी के घर पर उनसे मुलाकात के दौरान नंदा देवी राजजात यात्रा के बारे में उनसे सुना था, तभी रूपकुंड का भी​ जिक्र आया था। दोबारा नाम सुनते ही फटाक से बोल दिया—मैं भी चल रहा हूं तेरे साथ।
हां करने तक भी मुझे नहीं प​ता था कि देश के सबसे मुश्किल ट्रैकों में से एक रूपकुंड के पथरीले पहाड़ी रास्तों पर 65 किलोमीटर पैदल चल भी पाउंगा या नहीं। दोस्त से रामनगर में मिलने की योजना बनी, जहां से कार से हम आगे बढ़ गए। करीब 12 घंटे के सुहाने सफर के बाद हम चमोली जिले के आखिरी गांव वाण पहुंच चुके थे। बजरी से बनी सड़क आगे दम तोड़ चुकी थी। आगे तो बस हरे—भरे पहाड़ ओर उनके बीच छोटे—छोटे घर ही आंखों को लुभा रहे थे। यहां से आगे 8500 फुट की चढ़ाई हमें पैदल ही पार करनी थी। वैसे तो लोग यहां ग्रुप में आते हैं, जिनकी व्यवस्था कंपनियां करती हैं। मगर हम दोनों ने अकेले ही जाने का फैसला किया।

पहले दिन 13 किलोमीटर की चढ़ाई :

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अगले दिन हमने दो लोकल लड़कों को हायर किया, जो रास्ते में रहने-खाने की व्यवस्था के साथ हमारे गाइड की भूमिका निभाने वाले थे। पहले ही दिन हमें जंगलों से गुजरते हुए करीब 13 किमी तक चलना था। इसलिए थककर बैठने का सवाल ही नहीं था। घने जंगलों और मुश्किल चढ़ाई को पार करते हुए हम आगे बढ़ते रहे। कभी नदी किनारे बैठकर सांस ले ली तो कभी किसी पेड़ की छाांव तले थोड़ा सुस्ता लिए। जैसे—जैसे दोपहर बीत रही थी और हम आगे बढ़ रहे थे, बड़े—बड़े पेड़ आंखों से ओझल होते जा रहे थे। खूबसूरत घास से ढके हुए पहाड़ अब आंखों को सुकून पहुंचा रहे थे। हरी घास में छोटे—छोटे पीले फूलों से भरी बेदनी बुग्याल की वादी किसी विशाल पेंटिंग से कम नहीं दिख रही थी। पहाड़ों में बुग्याल हरी घास के मैदान को कहते हैं। सामने ढलते सूरज की रोशनी से पूरे पहाड़ सुर्ख हुए जा रहे थे। बगल में बहती नदी ने जैसे कोई मधुर संगीत छेड़ रखा था। शायद ऐसे नजारों को देखकर ही जन्नत की कल्पना की गई होगी। रात को यहीं रुकना था, तो टैंट गाड़ा जा चुका था। खाने की व्यवस्था के लिए टूर आॅपरेटरों ने यहां एक छोटे से ढाबानुमा होटल की व्यवस्था कर रखी थी।

प्रकृति ने दिखाया रौद्र रूप :

सब कुछ बहुत खूबसूरत लग रहा था, लेकिन जैसे ही सोने गए तो तूफान और बारिश ने जल्द ही प्रकृति के दूसरे रूप से भी रूबरू करा दिया। खैर हम दोनों बस यही दुआ करते रहे कि टैंट उड़े नहीं। कई घंटे डराने के बाद कब मौसम शांत हुआ पता ही नहीं चला।

दूसरे दिन हरी घास भी छूटी पीछे :

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अगले दिन मौसम का मिजाज ही दूसरा था। बर्फ से ढकी चोटियों के पीछे सूरज ने चुपके से आकर गुड मॉर्निंग कहा। सुबह आठ बजे हमने दूसरे दिन का सफर शुरू किया। सामने घास का मैदान और शरीर को गर्म अहसास देती धूप में हम दौड़े ही चले जा रहे थे। लेकिन थोड़ी देर में ही घास की जगह पथरीले रास्ते ने ली। ऊपर ऑक्सीजन कम होने की वजह से पेड़ पौधे नहीं होते, बस पत्थर और बर्फ।

जिकजैग रास्ते :

करीब 4 किमी आसान चढ़ाई करने के बाद असली चुनौती सामने दिखाई दी। राक्षस जैसा पहाड़ सामने था, उस पर जिकजैग रास्ता लुभा तो रहा था, लेकिन थका भी रहा था। जैसे-तैसे चढ़ ही रहे थे कि पत्थरों के साथ बर्फ के ग्लेशियर भी दिखने लगे, जिनके बीच में रास्ता बनाकर निकलना था। ऊपर से तेज बारिश और फिर ओले। बर्फ में पैर बार-बार धंस रहे थे। कई बार गिरा भी।

बर्फ का रेगिस्तान

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आखिरी बेसकैंप पर पहुंचे तो बस एक ही चीज दिख रही थी-बर्फ का रेगिस्तान। हमें इसी रेगिस्तान में टैंट लगाकर रात गुजारनी थी। कीचड़, बर्फ और पत्थरों के बीच जगह ढूंढकर हमने टैँट लगाया। जैसे ही टैंट में घुसे, जबरदस्त ओले पडऩे लगे और कीचड़ पर सफेद चादर बिछ गई। हम अपने टैंट में ही दुबके रहे।

आखिरी सफर की तैयारी

रातभर बारिश और ओले के बाद किस्मत ने फिर साथ दिया और सुबह 3 बजे मौसम साफ था। पौने चार बजे हम अपने आखिरी और सबसे मुश्किल सफर के लिए तैयार थे। दूरी करीब 3.5 किमी। लेकिन 2500 फुट की चढ़ाई और घुटनों तक जमी बर्फ। जहां पर रास्ते के नाम पर सिर्फ आगे चलने वालों के पैरों के निशान। पहले 15 मिनट में ही समझ में आ गया कि आखिर क्यों इसे टॉप-5 मुश्किल ट्रैक में रखा गया है। एक कदम भी बढ़ाना मुश्किल हो गया था। लेकिन धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। इस बीच बर्फबारी भी शुरू हो गई। मगर चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

रूपकुंड

करीब 4 घंटे तक बर्फीले पहाड़ पर चढ़ते और गिरते हुए हम आखिरकार अपनी मंजिल पर पहुंच गए। मेरी आंखों के सामने रूपकुंड था, जो पूरी तरह से जम चुका था। बर्फ की सफेद चादरों के बीच आसमानी रंग का यह कुंड मीठे जल से भरी किसी विशाल कटोरी सा दिख रहा था। मैं ज्यादा से ज्यादा इन नजारों को अपनी आंखों में भर लेना चाहता था। इस बीच कुछ ऐसा भी हुआ, जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। आसमान से फूलों के आकार की बर्फ ​पड़ने लगी। सीपियों जैसे बर्फ के इन फाहों को मैंने हाथ पर लेकर देखा, साथियों को भी दिखाया। मैं मन ही मन खुश हो रहा था। शायद यहां तक पहुंचने के बाद ईश्वर का दिया आशीर्वाद था वो…।

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