यहां मौत भी अपनों को जुदा नहीं कर पाती 

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खोनमा। नगालैंड का एक छोटा सा गांव। 700 साल से भी ज्यादा पुराने इस गांव के इतिहास में यूं तो ढेरों सुनहरे पन्ने हैं। शौर्य और पराक्रम की कहानियां हैं। देश के पहले ग्रीन विलेज के रूप में गौरवशाली पहचान है। मगर एक चीज जिसने मुझे सबसे ज्यादा छुआ, वो है अपनों का साथ कभी न छोड़ने का वादा। अक्सर हम बॉलीवुड में ही सुना करते हैं, हम मरकर भी जुदा नहीं होंगे! मगर इस फसाने को हकीकत में ढालने का काम इसी गांव ने किया है। एक ओर जहां हम अपनों के अलविदा कहने के चंद घंटों बाद ही उसे अपने से दूर कर देते हैं, वहीं अंगामी कबीले के लोग उन्हें हमेशा अपने साथ रखते हैं। मौत भी उन्हें अपनों से दूर नहीं कर पाती। 
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पूरे नगालैंड की तरह खोनमा में भी ईसाई धर्म की बहुलता है। अंगामी जनजाति के लोग बरसों पहले ईसाई धर्म को अपना चुके हैं। मगर फिर भी उन्होंने अपने कुछ रीति रिवाजों को संजोकर रखा है। इस गांव में एक अनूठी परंपरा है। यहां गांव से दूर अपनों को दफनाने के लिए कोई सामूहिक कब्रिस्तान नहीं है बल्कि मौत के बाद भी अपने जुदा न हों, इसके लिए घर में ही उनके लिए खास स्थान बनाया गया है। इस गांव के हर घर के नीचे या आंगन में अपनों को दफनाने की व्यवस्था है। परिवार के जितने सदस्य होते हैं, उतने ही कॉफिन की जगह घर के नीचे बनाई जाती है ताकि मरने के बाद भी परिवार के लोग एक—दूसरे से बिछड़े नहीं। इस गांव में हमारे गाइड मिस्टर खाते ने बताया कि हम अंगामी लोग अपने परिवार से काफी ज्यादा जुड़े रहते हैं, इसलिए मरने के बाद भी उन्हें खुद से अलग देखना नहीं चाहते। 

गांव को बचाने को लड़ी जंग : 

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अंगामी कबीले के लोग सिर्फ संवेदनशील दिल के ही मालिक नहीं हैं बल्कि अपने गांव पर आने वाली किसी भी मुसीबत से लड़ने के लिए वे बाहुबली भी हैं। इस कबीले के लोगों ने पहले दूसरी जनजाति के लोगों, फिर अंग्रेजों और फिर भारतीय सेना तक से लोहा लिया है। 1850 में ऐसी ही एक लड़ाई में अंगामी कबीले के लोगों ने ब्रिटिश सैनिकों को एक ही दिन में खदेड़ दिया था। गांव में जंग के निशान जगह—जगह देखने को मिलते हैं। खोनमा में खासतौर पर वॉर मैमोरियल भी बनाया गया है, जिसमें सभी लड़ाइयों का ब्योरा उपलब्ध है। 

दुश्मन को भी सम्मान : 

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खोनमा के पुरखे लड़ने में जितने शूरवीर थे, उतने ही मन के सच्चे भी। आज की तरह नहीं कि दुश्मन है, तो सारी हदें ही पार कर दी जाएं। एक सच्चे शूरवीर की तरह वे दुश्मन को भी सम्मान देना जानते थे। लड़ाई में मारे गए अंग्रेजों के शवों को बाकायदा पूरे सम्मान के साथ दफनाने के बाद उनके स्मारक भी बनाए गए। गांव में अभी भी इन स्मारकों को देखा जा सकता है। 

देश का पहला ग्रीन विलेज

नगालैंड के इस गांव को देश के पहले ग्रीन विलेज का दर्जा हासिल है। शिकार रोकने और पर्यावरण को बचाने के लिए 1998 में गांव की पंचायत ने खोनमा प्रकृति सरंक्षण की शुरुआत की। इसी प्रयास का नतीजा है कि यहां शिकार और जंगल कम होने की समस्या लगातार कम होती जा रही है। पूरे गांव में जगह—जगह आपको डस्टबीन दिख सकते हैं ताकि कोई कूड़ा इधर—उधर न डाले। यहां शिकार और जंगल काटने पर पूरी तरह से बैन है।  

 

मेहनत का फल
1998 में खोनमा गांव परिषद ने करीब 2000 हेक्टेयर वन को खोनमा नेचर कंजरवेशन और वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के रूप में घोषित कर दिया। इसका नतीजा यह है कि आज यहां 250 से ज्यादा प्रजाति के पौधे, 70 से ज्यादा मेडिकल प्लांट, 84 तरह के जंगली फल, 116 तरह की जंगली सब्जियां, 204 तरह के पेड़ मिल जाएंगे। यही नहीं यहां के जंगलों में 25 से ज्यादा तरह के सांप, 19 प्रकार की छिपकलियां और पक्षियों की करीब 200 प्रजातियां मौजूद हैं। बाघ, तेंदुए, भालू का घर तो यह है ही।

कैसे पहुंचे :

खोनमा नगालैंड की राजधानी कोहिमा से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर है। यूं तो आप सरकारी बस से भी यहां जा सकते हैं, लेकिन अच्छा यही रहेगा कि आप कोहिमा से निजी टैक्सी करके पहुंचे। हमें करीब 2000 रुपये में खोनमा और पूरे कोहिमा ट्रिप के लिए टैक्सी मिल गई थी। आप चाहें तो सोनू ड्राइवर 09077340229 से भी संपर्क कर सकते हैं।   
 

इनसे मिलें :

खोनमा गांव के इतिहास को समझने के​ लिए आप मिस्टर खाते 08575217214 से संपर्क कर सकते हैं। वह बहुत ही अच्छे ​इंसान हैं और खोनमा के सुनहरे इतिहास से अच्छी तरह वाकिफ हैं। 

6 thoughts on “यहां मौत भी अपनों को जुदा नहीं कर पाती 

  1. बहुत बढ़िया पोस्ट है। ऐसे ही हिंदुस्तान की विविधताओं और अनूठेपन से परिचित करते रहिए। शुभकामनाएं।

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