प्रकृति से प्यार का अनोखा जश्न 

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पाया लिंचो! यानी शुक्रिया, अरुणाचल प्रदेश के या​जाली गांव से लौटते वक्त एक यही शब्द था, जो हम सब की जुबां पर था। यहां हर साल फरवरी महीने में होने वाले  न्योकुम  फेस्टिवल को इस बार करीब से जानने का जो मौका मिला था। फसल की बुआई से पहले मनाए जाने वाले इस फेस्टिवल में सब कुछ था, प्रार्थना, अनुष्ठान, मौज—मस्ती, लोगों की एकजुटता, सांस्कृतिक झलक, लेकिन एक चीज जो सबसे खास थी, वह थी प्रकृति के प्रति आदर और प्यार। इस फेस्टिवल को धूमधाम से मनाने वाले निशी समुदाय के लोगों के लिए सच्चा ईश्वर मंदिर या मस्जिद में नहीं बल्कि पेड़, पौधों, झरनों, पहाड़, बारिश में बसा हुआ है, जो हर पल इन्हें अपनेपन का अहसास दिलाता है।

सर्वे भवंतु सुखिने का भाव

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 न्योकुम  दरअसल न्यो और कुम दो शब्दों से मिलकर बना है। न्यो मतलब संपूर्ण धरती और कुम से मतलब एकजुटता से है। इसीलिए इस वार्षिक अनुष्ठान में न सिर्फ संपूर्ण मानव जाति बल्कि पशु—पक्षियों की खुशहाली की कामना के लिए सभी देवी—देवताओं का अनुष्ठान किया जाता है।  न्योकुम  देवी या वर्षा की देवी को सबसे प्रमुख देवी माना जाता है। 4 से 5 दिन चलने वाले इस फेस्टिवल में समुदाय के पांच प्रमुख पुजारी दिन—रात मंत्रोच्चार कर खुशहाली, अच्छी फसल और अच्छी सेहत की प्रार्थना करते हैं। विशेष पूजा से बुरी व नकारात्मक शक्तियों को पहले घर से और फिर गांव से बाहर किया जाता है ताकि हर कोई सकारात्मक उर्जा से भरा रहे। न्योकुम में ​चौथे दिन मिथुन की बलि दी जाती है और अंतिम दिन इस जीव हत्या के लिए ईश्वर से माफी भी मांगी जाती है।

50वीं सालगिरह

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यूं तो निशी समुदाय लंबे समय से न्योकुम मनाता आ रहा है, लेकिन 1968 से इसे पूरा गांव मिलकर बड़े पैमाने पर मनाने लगा। इस बार न्योकुम की 50वीं सालगिरह थी, इसलिए जश्न भी बड़े पैमाने पर मनाया गया। मैं उन चंद खुशनसीबों में से एक था, जिसे प्रकृति की पूजा में शामिल होने का मौका मिला। पैनयोर नदी के किनारे बसे गांव में पहला कदम रखते ही शहरीपन का तनाव पीछे छूट जाता है और आप खुद ब खुद फेस्टिवल में चल रहे सांस्कृतिक संगीत की धुन पर थिरकने लगते हैं।

चार दिन का जोरदार जश्न 

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ऐसा नहीं है कि न्योकुम सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान है, यहां अपोंग स्थानीय शराब की मस्ती भी है और सांस्कृतिक रंग भी। बांस के बने गिलास से ली गई अपोंग की चुस्की को कोई नहीं भूल सकता है। फेस्टिवल के लिए गांव के बड़े ग्राउंड में तैयारियां की जाती हैं। एक स्थान पूजा के लिए निर्धारित किया जाता है, जहां 24 घंटे मंत्रोच्चार कर देवी—देवताओं को खुश करने का प्रयास किया जाता है। बड़ा सा मंच तैयार किया जाता है, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों से लेकर रॉक कन्सर्ट और फैशन शो तक होता है। खाने—पीने के भी कई स्टॉल लगाए जाते हैं। रस्साकशी, नैयरकमिनम यानी बांस को लेकर एक तरह की कुश्ती के जरिए समुदाय के लोग अपनी ताकत का भी परिचय देते हैं। खूबसूरत परिधानों में सजे बच्चों को देखकर तो कोई भी उन्हें कैमरे में कैद करने से नहीं रोक पाएगा।

निशी समुदाय के लोग : 

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अरुणाचल प्रदेश में सात प्रमुख जनजातियां हैं, जिनमें से निशी प्रमुख है। अपातानी, मोनपास, आदि और गोलपास के साथ निशी इस राज्य की प्रमुख जनजाति है। इस जनजाति के लोग खुद को सूर्य के वशंज मानते हैं। ऐसे में प्रकृति से उनका नाता आसानी से समझा जा सकता है। निशी का मतलब पहाड़ पर रहने वाला इंसान भी होता है।

ताकि युवा पीढ़ी समझे महत्व :

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न्योकुम फेस्टिवल को लेकर गांव के बुजुर्गों की एक चिंता भी इस दौरान दिखी। बाकी जगहों की तरह यहां भी युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से कटती दिखाई दी। हालांकि पारंपरिक पोशाकों में मौज—मस्ती करते वे जरूर दिखे। अपनी संस्कृति को सहेज कर रखने और परंपरा को भविष्य में बनाए रखने के लिए समुदाय के लोग कई प्रयासों में जुट गए हैं। युवाओं को अपनी जड़ों के प्रति जागरुक करने के ​अलावा ​खास लिपी भी तैयार की जा रही है।

बांस के घर, बांस की टोकरी में खाना

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फेस्टिवल के दौरान हम पूरी तरह से प्रकृति की गोद में थे और इस दौरान निशी समुदाय की एक और कला ने मुझे बेहद प्रभावित किया। वैसे तो पूर्वोत्तर के कई राज्यों में बांस का बेहतर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन निशी समुदाय ने तो इसे अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया। घर, पुल, नदी पार करने के लिए, पूजा के लिए और खाना बनाने व खाने में तो इसका इस्तेमाल था ही, लेकिन खुद को सजाने—संवारने में भी बांस का बेजोड़ इस्तेमाल दिखाई दिया।

कब जाएं

न्योकुम फेस्टिवल हर साल 23 से 27 फरवरी के बीच याजाली गांव में मनाया जाता है। निशी समुदाय के लोग पूरी गर्मजोशी से मेहमानों का स्वागत करते हैं, तो अगले साल आप प्रकृति की इस पूजा का हिस्सा बन सकते हैं।

कैसे पहुंचे

दिल्ली से आप विमान से गुवाहाटी पहुंच सकते हैं। यहां से पलटन बाजार स्थित रेलवे स्टेशन तक शेयर टैक्सी और वोल्वो बस चलती है। रोजाना रात 9.20 बजे यहां से नाहरलगुन ईटानगर के लिए ट्रेन है। इसके बाद करीब डेढ़ घंटे की यात्रा के लिए शेयर सूमो आसानी से मिल जाती हैं।
आप चाहें तो दिल्ली से सीधे ईटानगर के लिए भी ट्रेन ले सकते हैं।

इन बातों का रखें ध्यान 

—अपने स्थान रेनकोट या छतरी जरूर रखें क्योंकि बारिश कभी भी आपका स्वागत कर सकती है।
—बेहतर होगा कि आप इनर लाइन परमिट रवाना होने से पहले ही आॅनलाइन बनवा लें। हालांकि ईटानगर रेलवे स्टेशन पर भी इसे बनवाया जा सकता है।
—अगर आप शाकाहारी हैं, तो पैक्ड खाना या सूखे मेवे आदि अपने साथ रखें।
—किसी की तस्वीर खींचने से पहले उससे जरूर पूछें।
—याजाली में चंद ही गेस्ट हाउस हैं, ऐसे में आप आयोजकों से भी मदद ले सकते हैं।

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